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Sunday, July 26, 2015

जर्मनी- पुरे विशव में एक मात्र यही चलती है ‘हैंगिंग ट्रेन’

10:30 AM Posted by Unknown , , No comments
जर्मनी में एक ऐसी रेल सेवा है जिसकी ट्रेनें लटक के चलती हैं। यह रेल सेवा काफी पुरानी है और इसकी शुरुआत 1901 में ही हो गई थी। जर्मनी के वुप्पर्टल इलाके में चलाई जाने वाली इन ट्रेनों में रोज करीब 82 हजार लोग ट्रैवल करते हैं। दिलचस्प ये है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए इस ट्रेन की किसी दूसरे देश या शहर में नकल नहीं की गई।
मात्र एक बार हुआ है हादसा
एक रिपोर्ट के मुताबिक हैंगिंग ट्रेन सिर्फ एक बार गंभीर हादसे की शिकार हुई है। 1999 में हुई दुर्घटना में ट्रेन वुप्पर नदी में गिर गई थी जिसमें 5 लोग मारे गए थे और करीब 50 घायल हो गए थे। इसके अलावा 2008 और 2013 में भी मामूली दुर्घटनाएं हुई थी, लेकिन उसमें किसी की मौत नहीं हुई। हैंगिंग ट्रेन के ट्रैक की लंबाई 13.3 किलोमीटर है और यह नदी से 39 फीट ऊपर चलती है। ट्रेन के रुकने के लिए 20 स्टेशन बनाए गए हैं। ट्रेन बिजली से चलती है।

क्यों चलाई गई हैंगिंग ट्रेन
इस ट्रेन के हैंगिंग होने की वजह ये है कि वुप्पर्टल शहर 19वीं शताब्दी के अंत तक अपने औद्यौगिक विकास के चरम पर पहुंच गया था। सड़कें तो थी, लेकिन सामान ढोने के लिए और पैदल चलने वाले लोगों के लिए। वहां पर जमीन पर चलने वाली ट्रामें चलानी मुश्किल थी। पहाड़ी इलाका होने की वजह से अंडरग्राउंड रेल भी नहीं चलाई जा सकती थी। इसी स्थिति में कुछ इंजीनियरों से हैंगिंग ट्रेन चलाने का फैसला किया। इसे दुनिया की सबसे पुरानी मोनो रेल में से एक भी माना जाता है।
 

महादेवशाल धाम – जहाँ होती है खंडित शिवलिंग की पूजा – गई थी एक ब्रिटिश इंजीनियर की जान

हमारे शास्त्रों में शिवजी सहित किसी  भी देवता की खंडित मूर्ति की पूजा करने की मनाही है लेकिन शिवलिंग एक अपवाद है वो चाहे कितना भी खंडित हो जाए , सदैव पूजनीय है।   इसका जीता-जागता उदाहरण झारखंड के गोइलकेरा में स्तिथ महादेवशाल धाम मंदिर में देख सकते है। इस मंदिर में एक खंडित शिवलिंग की पूजा पिछले 150 सालों से हो रही है।  इस शिवलिंग की कहानी भी बड़ी अचरज़ भरी है इस शिवलिंग को तोड़ने के कारण एक ब्रिटिश इंजीनियर को अपनी जान गवानी पड़ी थी।

यह कहानी है 19 वी शताब्दी के मध्य की जब गोइलेकेरा के बड़ैला गाँव के पास बंगाल-नागपुर रेलवे द्वारा कलकत्ता से मुंबई के बीच रेलवे लाइन बिछाने का कार्य चल रहा था। इसके लिए जब मजदूर वहां खुदाई कर रहे थे तो उन्हें खुदाई करते हुए एक शिवलिंग दिखाई दिया। मजदूरों ने शिवलिंग देखते ही खुदाई रोक दी और आगे काम करने से मन कर दिया। लेकिन वहां मौजूद ब्रिटिश इंजीनियर ‘रॉबर्ट हेनरी’ ने इस सब को बकवास बताते हुए फावड़ा उठाया  शिवलिंग पर प्रहार कर दिया जिससे की शिवलिंग दो टुकड़ो में बट गया पर इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ और शाम को काम से लौटते वक़्त उस इंजीनियर की रास्ते में ही मौत हो गई।

इस घटना के बाद मजदूरो और ग्रामीणो ने रेलवे लाइन की खुदाई का जोरदार विरोध किया।  पहले तो अंग्रेज़ अधिकारी वही पर खुदाई करने पर अड़े रहे पर जब उन्हें महसूस हुआ की यह आस्था एवं विश्वास की बात है और ज़बरदस्ती करने के उलटे परिणाम हो सकते है तो उन्होंने रेलवे लाइन के लिए शिवलिंग से दूर  खुदाई करने का फैसला किया। इसके कारण रेलवे लाइन की दिशा बदलनी पड़ी और दो सुरंगो का निर्माण करना पड़ा।

शिवलिंग के दोनों टुकड़ो की होती है पूजा :
खुदाई में जहां शिवलिंग निकला था आज वहां देवशाल मंदिर है तथा खंडित शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है। जबकि शिवलिंग का दूसरा टुकड़ा वहां से दो किलोमीटर दूर रतनबुर पहाड़ी पर ग्राम देवी ‘माँ पाउडी’ के साथ स्थापित है जहां दोनों की नित्य पूजा-अर्चना होती है। परम्परा के अनुसार पहले शिवलिंग और उसके बाद माँ पाउडी की पूजा होती है।

सोन भंडार गुफा – राजगीर (बिहार) – इसमें छुपा है मोर्ये शासक बिम्बिसार का अमूल्य ख़ज़ाना

बिहार का एक छोटा सा शहर राजगीर जो कि नालंदा जिले मे स्तिथ है कई मायनों मे मत्त्वपूर्ण है। यह शहर प्राचीन समय मे मगध कि राजधानी था, यही पर भगवान बुद्ध ने मगध के सम्राट बिम्बिसार को धर्मोपदेश दिया था।  यह शहर बुद्ध से जुड़े स्मारकों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

इसी राजगिर में है सोन भंड़ार गुफ़ा जिसके बारे मे किवदंती है कि इसमें बेशकीमती ख़ज़ाना छुपा है, जिसे की आज तक कोइ नही खोज पाया है।  यह खजाना मोर्ये शासक बिम्बिसार का बताया जाता है, हालांकि कुछ लोग इसे पूर्व मगध सम्राट जरासंघ का भी बताते है। हालांकि इस बात के ज्यादा प्रमाण है कि यह खजाना बिम्बिसार का हि है क्योकि इस गुफ़ा के पास उस जेल के अवशेष है जहाँ पर बिम्बिसार को उनके पुत्र अजातशत्रु ने बंदी बना कर रखा था।

 चट्टानों को काटकर बनाई गई सोन भंडार गुफा

सोन भण्डार गुफा मे प्रवेश करते हि  10 . 4 मीटर लम्बा,  5 . 2  मीटर चोडा  तथा 1 . 5 मीटर ऊंचा  एक कक्ष आता है, इस कमरा खजाने कि रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए था।   इसी कमरे कि पिछली दीवर से खजाने तक पहूँचने का रास्ता जाता है। इस रास्ते का प्रवेश द्वार पत्थर कि एक बहुत बडी चट्टान नुमा दरवाज़े से बन्द किया हुआ है।  इस दरवाज़े को आज तक कोइ नही खोल पाया है।

 सोन भण्डार गुफा के अन्दर सैनिको का कक्ष 

गुफा की एक दीवार पर शंख लिपि मे कुछ लिखा है जो कि आज तक पढ़ा नही जा सका है। कहा जाता है की इसमें ही इस दरवाज़े को खोलने का तरीका लिखा है।

 सोन भण्डार गुफा कि दीवार पर शंख लिपि मे लिखी जानकारी  

कुछ लोगो का यह भी  मानना है कि खजाने तक पहुचने का यह रास्ता वैभवगिरी पर्वत सागर से होकर सप्तपर्णी गुफाओ तक जाता है, जो कि सोन भंडार गुफा के दुसरी तरफ़ तक पहुँचती है। अंग्रज़ों ने एक बार तोप से इस चट्टान को तोड़ने कि कोशिश कि थीं लेकिन वो इसे तोड़ नही पाये।  तोप के गोले का निशाँ आज भी चट्टान पर मौजुद है।

 सोन भंडार के पास स्तिथ दूसरी गुफा  

इस सोन भंड़ार गुफ़ा के पास ऐसी हि एक और गुफा है जो कि आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इसका सामने का हिस्सा गिर चुका है।  इस गुफा की दक्षिणी दीवार पर 6 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां उकेरी गई है।

दूसरी गुफा कि दीवार पर उत्कीर्ण जैन तीर्थंकरों कि मूर्तियां

दोनों ही गुफाये तीसरी और चौथी शताब्दी मे चट्टानों को काटकर बनाई गई है।  दोनों ही गुफाओं के कमरे पोलिश किये हुए है जो कि इन्हे विशेष बनाती है, क्योकि इस तरह पोलिश कि हुईं गुफाये भरत मे बहुत कम है।इस बात के भी प्रमाण है की यह गुफाये कुछ समय के लिये वैष्णव सम्प्रदाय के अधीन भी रही थी क्योकि इन गुफ़ाओं के बाहर एक विष्णु जी कि प्रतिमा मिलि थी।  विष्णु जी की यह प्रतिमा इन गुफाओं के बाहर स्थापीत कि जानी थी।  पर मूर्ति की फिनिशिंग का काम पुर होने से पहले ही उन लोगो को, किसी कारणवश यह जगह छोड़ कर जाना पड़ा और यह मूर्ति बिना स्थपना के रह गई।  वर्तमान में यह मूर्ति नालंदा म्यूज़ियम मे रखी है।









 

CIA के टॉप 10 सीक्रेट ऑपरेशन

1:26 AM Posted by Unknown , No comments
1.म्यांमार सीमा के अंदर की गई भारतीय सेना की कार्रवाई उजागर करने को लेकर काफी हो हल्ला मचा। ये पहली बार नहीं है कि भारतीय सेना ने ऐसी कोई कार्रवाई की हो। दुनिया के अन्य देश काफी बड़ी कार्रवाइयां करते रहे हैं। आज इस कड़ी में दुनिया के सबसे खतरनाक जासूसी संगठन सीआईए(अमेरिका) के टॉप 10 सीक्रेट मिलिटरी ऑपरेशनों के बारे में बताते  है, जिनके बारे में आपने शायद ही सुना हो। अगली स्लाइड्स में जानिए सीआईए के टॉप सीक्रेट ऑपरेशंस


2.अमेरिका की ये सबसे खतरनाक खुफिया चाल थी। जिसे दुनिया काफी बाद में समझ पाई। सीआईए ने 1978 में अफगानी सिविल वार के समय इस खतरनाक योजना को अंजाम दिया। दरअसल, उस समय अफगानिस्तान पर कब्जे को लेकर दो कम्युनिस्ट शक्तियां लड़ रही थीं, जिनके सफाए के लिए अमेरिका ने एंटी कम्युनिस्ट विद्रोहियों को तमाम मदद दी। मुजाहिद्दीन को ट्रेनिंग दी, पैसा और हथियार दिए। लड़ाकू विमानों को भी मार गिरा देने की शक्ति दी। हालांकि बाद में ये अमेरिका के लिए ही घातक सिद्ध हुआ लेकिन उस समय अमेरिका की पूरी रणनीति सफल रही और सोवियत रूसी सेना को पीछे हटना पड़ा।

3.फ्योनिक्स कार्यक्रम को सीआईए ने स्पेशल अमेरिकी फोर्स, ऑस्ट्रेलियन फोर्स और दक्षिण वियतनामी कमांडरों के साथ मिलकर वियतनाम युद्ध के समय चलाया था। इसके तहत उत्तर वियतनामी फौज को नहीं, बल्कि उन आम लोगों को निशाना बनाया गया, जो कम्युनिस्ट को लेकर थोड़ी भी सहानुभूति रखते थे। फ्योनिक्स कार्यक्रम के तहत हजारों आम लोगों का अपहरण किया गया, यातनाएं दी गईं, यहां तक कि मौत के घाट उतार दिया गया। इस दौरान महिलाओं के साथ गैंगरेप किया गया, सांपों से डसाया गया, बिजली के झटके दिए गए, यहां तक कि संवेदनशील अंगों को शरीर से अलग कर दिया गया। लोगों को कुत्तों से कटवाया गया, तो घोड़ों के टापुओं से रौंद दिया गया। इसकी असलियत खुलने के बाद इसे बंद कर दिया गया, इसकी जगह एफ-6 कार्यक्रम ने ले ली।

4.इस ऑपरेशन को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने 1960 के दशक से वियतनाम युद्ध के काफी बाद तक चलाया। इसके तहत छात्रों तक पर निगाह रखी गई और विरोध की आवाज उठते ही लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। ऑपरेशन केऑस के तहत लाखों अमेरिकियों की जासूसी की गई। ये कार्यक्रम वाटरगेट प्रकरण के बाद बंद कर दिया गया। इसी तरह चलाए गए एक कार्यक्रम का 2011 में खुलासा हुआ, जब सीआईए पर आरोप लगे कि वो अमेरिकी मुस्लिमों की जासूसी कर रही है।

5.सीआईए का ये ऑपरेशन काफी सफल रहा। ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के तहत सैकड़ों पत्रकारों की नियुक्ति सीआईए ने की और उन्हें तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराकर पूरी दुनिया की जासूसी कराई। पत्रकार के पकड़े जाने पर कोई भय भी नहीं था, क्योंकि अमेरिकी सरकार इसे खोजी पत्रकारिता का नाम दे देती थी। ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को दुनिया भर में विरोधियों की तमाम गतिविधियों का पता चलता रहा। इस कार्यक्रम के खुलने के बाद काफी अमेरिकी पत्रकारों की हत्याएं अमेरिका विरोधी देशों में हुईं। डेनियल पर्ल जैसे मारे गए पत्रकार पर भी सीआईए एजेंट होने के आरोप लगे। ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के खुलने के बाद ईमानदार पत्रकारों की जिंदगी पर भी बन आई और पत्रकारिता खतरनाक पेशों में शुमार हो गई।

6.सीआईए ने पाकिस्तान के एटबाबाद में अल-कायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को मारने से पहले उसकी पहचान सुनिश्चित की। जिसके लिए एटबाबाद में लंबे समय तक टीकाकरण कर डीएनए एकत्रित किए। ये सीआईए का खास कार्यक्रम था, जिसके दम पर ओसामा की पहचान और फिर खात्मा हो सका। पूरे ऑपरेशन को दुनिया ने तब जाना, जब ओसामा को अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन टीम ने मार गिराया।

7.भूमिगत परमाणु ऊर्जा चालित शहर बनाने की योजना सीआईए की थी, जो ग्रीनलैंड में बनाई गई थी। ग्रीनलैंड आधिकारिक रूप से अमेरिका का हिस्सा नहीं है, इसके बावजूद बर्फ के नीचे 200 लोगों के रहने के लिए ये शहर बनाया गया। जहां परमाणु हमले की स्थिति में भी सुरक्षित रहा जा सके। इस छोटे से शहर का पता लगाना बेहद मुश्किल था। जहां जिम, लाइब्रेरी, थिएटर जैसी सुविधाएं थीं। यहां वैज्ञानिकों को रखा गया था। इसे बाद में एक डॉक्यूमेंटरी में भी दिखाया गया। इसे बाद में फौज के हवाले कर दिया गया, जहां 600 परमाणु मिसाइलों को रखा जाना था। इस तरह से रूस पर हमला आसानी से किया जा सकता था, जिसका रूस के पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन इसे रूस की किस्मत समझें या कुछ और। तकनीकी खामियों की वजह से इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया, क्योंकि इस जगह को ठंडा बनाए रखने की वजह से 120 टन बर्फ हर माह नष्ट कर दी जाती थी। ये पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद घातक सिद्ध हुई ।

8.ये कार्यक्रम सीआईए की तरफ से डोमेस्टिक ऑपरेशंस डिवीजन(डीओडी) ने चलाया। इसके तहत सीआईए के लिए खतरा बन सकने वाले उन सभी लोगों की जासूसी की गई, जो सीआईए का विरोध कर सकते थे। ऐसे लोगों की सूची बनाए जाने के साथ ही उनके अतीत की जानकारियां भी जुटाई गईं। प्रोजेक्ट रेसिस्टेंस के दौरान कई लोग रहस्यमय ढंग से गायब हो गए, जिनका अबतक पता नहीं चल सका है।

9.स्टारगेट प्रोजेक्ट अमेरिकी सरकार की तरफ से चलाया गया कार्यक्रम था। जिसके तहत दुश्मनों या विरोधी देशों के सैन्य ठिकानों पर दूरदर्शी उपकरणों की मदद से नजर रखी जाती थी। इसे रिमोट व्यूविंग प्रोग्राम के तहत चलाया गया। जॉर्ज जी मॉएड के किले को सैन्य हेडक्वार्टर में बदल दिया गया। बाद में मामले का खुलासा होने पर प्रोजेक्ट को 1995 में बंद कर दिया गया।


10.ऑपरेशन क्यूफायर को ग्वाटेमाला में चलाया गया, जिसके तहत कम्युनिस्ट नेताओं पर नजर रखी गई। इसी कार्यक्रम की मदद से चे-ग्वेरा को बोलिवियनों ने पकड़ लिया और टॉर्चर करके मौत के घाट उतार दिया। चे-ग्वेरा से मामले के जुड़ने और चे के मारे जाने के बाद सीआईए की काफी बदनामी हुई। हालांकि सीआईए का ये प्रोजेक्ट काफी सफल रहा।


11.ऑपरेशन वॉशटब को सीआईए ने ग्वाटेमाला को सोवियत संघ का नजदीकी बताकर बदनाम करने के लिए चलाया था। इसके तहत सीआईए ने निकारागुआ में फर्जी रूसी जंगी जहाज तैनात कराए। भले ही ऑपरेशन वॉशटब पूरी तरह से सफल नहीं हुआ, पर उस दौरान ग्वाटेमाला को खासी बदनामी उठानी पड़ी। इसी नाम से 1950 के दशक में फ्लोरिडा में भी सीआईए ने ऐसा ही प्रोजेक्ट चलाया। जिसमें 1950-1959 के बीच 89 प्रशिक्षित एजेंट्स सोवियत संघ के प्रशासन को भेदने के लिए भेजे गए। इस प्रोजेक्ट का खुलासा 2014 में अमेरिकी सरकार द्वारा जारी दस्तावेजों से हुआ

Friday, July 24, 2015

सर्वे: बिहार का ओपिनियन POLL

नितीश 52% और सुशील मोदी 42% लोगों की पसंद
बिहार में सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में नितीश 52% और नरेंद्र मोदी 42%
मोदी की लोकप्रियता में आई कमी
NDA में नीतीश को टक्कर के सवाल पर सुशिल मोदी 48%, शाहनवाज़ हुसैन 10%, रामविलास पासवान 6%, उपेंद्र खुश्वाहा 3% नंबर पर
ललित मोदी काण्ड से बीजेपी को नुक्सान के जवाब में सर्वे आया कि हाँ 30% और न 49%, पता नहीं 21%
नरेंद्र मोदी सरकार में बिहार के विकास के सवाल में जवाब आया कि हाँ 56%, नहीं 40%, पता नहीं 4%

नीतीश के साथ मांझी पप्पू के अलग होने पर किसे फायदा होगा के सवाल पर जवाब = बीजेपी 61%, jdu 35%, पता नहीं 4%

बिहार के मगध से बीजेपी 37+ JDU 25+ अन्य 0
बिहार के भोजपुर से बीजेपी 19+ JDU 6+ अन्य 0
बिहार के पूर्वी क्षेत्र से बीजेपी 33+ JDU 9+ अन्य 0
बिहार के तिरहुत क्षेत्र से बीजेपी 32+ JDU 38+ अन्य 2

बिहार के मिथिला क्षेत्र से बीजेपी 15+ JDU 27+ अन्य 0